कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

जैसा मैने मोदीजी को समझा ..... मेरी नई कविता हाँ एक लाइन माना कि जगजीतजी की ग़ज़ल का हिस्सा है



दायरे में न बांधो मुझे
कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

लफ्ज़ और भाषाओँ की
सीमा में न बांधो मुझे
कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

लिबासों और परिधानों
के स्वरुप से न आंको मुझे
कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

कद काठी रंग रूप
के तराजू से न तौलो मुझे
कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

मेरे तरानों फसानों
में न तलाशो मुझे
कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

मेरे एकाकीपन के दायरे
से तनहा न समझो मुझे
कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

भारत के टुकडों को जोड़
एक महाद्वीप फिर बनाओ
कि मैं ज़िंदा हूँ अभी

जिस तुष्टिकरण ने देश को बर्बाद किया
उसे तिलांजलि दे, सही मायने में आज़ादी पाओ
कि हम ज़िंदा हैं अभी

इंसानियत का झंडा फहरा
दिलों में प्यार बसा,सीमाएं मिटा
हर बांटने वाले पैंतरे पर पलटवार कर
मोदी के सपनों के भारत में सहयोग दे
कि तू ज़िंदा है अभी

डॉ अर्चना टंडन


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