जीवनदान



इक सैलाब आज धार बन 
बह निकला है
मत तुम इसे आज रोकना
इक बाँध जो बरसों से इसे थामे था
आज जर्जर हो ध्वस्त हुआ है
तुम इस पर आज विवाद न करना
क्योंकि चमक है इसमें
आज ये स्याह नहीं
बरसों का इसमें
सिमटा सकुचाया वेग नहीं
ये यौवन है इसका
आज जो बह निकला है
हरियाली चहुँ ओर बिखेरने
को ही शायद आज ये आज़ाद हुआ है 
बहने दो इसे
ये सैलाब है प्यार का
विश्वास का अरमानों का
जीवनदान है
जो आज तुमने इसे दिया है

डॉ अर्चना टंडन 


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