सम्मोहन में छिपी है विरक्ति




The link to where I recite the poem and try to elaborate on my interpretation of it.

https://youtu.be/WL50gmZobV0

बहुत बड़ी हो तुम
फैली, बहुरंगी
विस्तार में अपने
कोणों को समेटे हुए

मैं भी तो एक प्रकार हूँ
तुम्हारे आकार का
समझना चाह के भी
नही समझ सकती तुम्हें कभी

सिर्फ अपलक निहारना
तुम्हारी गति से अचम्भित होना
तुम्हारे रंगों में डूब जाना
तुम्हें क़ैद कर लेना और संजोना
कहीं भीतर तक तर कर जाता है मुझे
प्यास बुझती नहीं पर तृप्त हो जाती हूँ मैं कहीं

सम्मोहित हो निकल पड़ती हूँ
ढूंढने फिर एक नया कोण
जो धीरे धीरे अपना आकार खो
कभी फैल कर वृत्त में,
कभी सिमट कर शून्य में
और कभी एक लकीर
का रूप धारण कर
सुलझा जाता है
मेरे अनेक प्रश्नों को
और दे जाता है एक निर्देश
सम्मोहन से गुजरते हुए विरक्ति का

डॉ अर्चना टंडन


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