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Showing posts from July, 2014

वो मेरे कुछ बेहद अपने पल

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                                                                                  वो मेरे कुछ बेहद अपने पल     रोज सुबह सवेरे का सैर सपाटा   और मेरी   रोज की  ये   दिनचर्या   धरती के छोर से   झाँकती हुई    वो   सुबह की लालिमा   और   मन को सुकून देती   मिटटी की वो   सोंधी  खुशबू   फूलों के वो    चटक रंग , और वो    उड़ान भरते   जीव जंतु     कहीं  है   कोयल की कूक   तो कहीं  है   वानरों का उत्पात दीखता है हर जगह   उस ईश्वर का ही प्रताप   कभी  छायाचित्र लेना तो   कभी दूब पर यूँ ही    बैठ जाना     कभी पतंगों को हवा में स्थिर   तो   कभी इठलाते...

एक सुनहरा सफर

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  साँसारिक सफर के  हमसफ़र  तुम और मैं अपने अपने फन में मगन गुफ्तगू करते चलते गए अनवरत और देखो तो कहाँ तक निकल आये आह्लादित हूँ मैं तुम्हारी इस उम्दा पहचान से इस सकारात्मक सोच से इन  विवेकी अभिव्यक्तियों  से इन मनीषी कथनों से इन चिन्तनशील अदाओं से तो फिर क्यों न आवाज़ दूँ अपनी इन भावनाओं को आकांक्षाओं को अपेक्षाओं को कुछ गहराती कुछ उफनती अंतर्मन की इन उम्मीदों को और चलती रहूँ छोड़  पीछे  कुछ अंधकारमयी साए लिए हुए शाश्वत एक चिरकालिक  पूर्णविराम की उम्मीद अर्चना टंडन

गुरुत्वाकर्षण

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गुरुत्वाकर्षण का केंद्र मुझमें  है और तुम में भी धरती में है और मंगल में भी  सूरज में है और चाँद में भी  और हम सब को खींच रहा है  अपने ही अंदर के देवत्व का आकर्षण  जिसे सब कहते हैं गुरुत्वाकर्षण  अपने गुरुत्वाकर्षण से खींचते दूसरों के से खिंचते  कभी रोते  तो कभी हँसते गाते कभी रुलाते तो कभी हँसाते  कुछ पल जीते कुछ जिलाते कुछ को सहारा देते तो कुछ से लेते  कुछ हासिल करने की चाह लिए कभी कुछ खोते कभी पाते  चले जा रहे हैं उसके गुरुत्वाकर्षण से  खिंचे उस गुरु से मिलने उसके अंदर समाने  उस अनंत परमात्मा का आकर्षण  ही  है  असली गुरुत्वाकर्षण -- अर्चना टंडन  

ज़िन्दगी मेरी कलम से

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        ज़िन्दगी मेरी कलम से किताब मेरी कलम मेरी सोच मेरी  मगर जो लिखती हूँ वो दुनिया से ही सीखा है  अश्क है रश्क है या ख़ुशी के दो लफ्ज़ हैं  ये फसानों को बयां करती रचना मेरी है समझ समझ की  बात  है वरना   ज़िन्दगी  भी तो इक  बिसात  है ग़र   समझ  सकें हम इस बात  को तो  हंस कर गुजार लेंगे  ईश्वर की इस सौगात  को  नवाज़िश  करम  शुक्रिया  मेहरबानी  करते  करते गुजारोगे  जो  ज़िंदगानी  रहमतों की बारिश से जो फिर सजेगी ज़िन्दगी की धुरी  तो  रह न जाएगी फिर  कोई भी ख्वाहिश अधूरी ज़िन्दगी सुलझती है  या कि ज़िन्दगी  उलझती है  वक़्त  बदलता  है  य़ा कि  वक़्त  संवरता  है   क्या  आज  की परेशानी  है  बीते  कल  की  पशेमानी  का  सबब या   कि  होगी  कल  की  रवानी  आज  की  अक़ीदतों  का ...

आग़ोशे -- तन्हाई

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आगोशे – तन्हाई जली हूँ मैं कहीं रोशनी बिखेरने के लिए    जान कर भी कि इस जूनून का अंत रुसवा ई है तनहा न समझ तू मुझे सुकून मिला है मुझे इस आगोशे त न्हाई में अर्चना टंडन 

एक अर्थपूर्ण सफर की प्यास

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जिस रचना में एहसास को महसूस न कर सकें जिस रचना से ईमान पर  लगाम न कस सकें जिन रचनाओं को शाब्दिक लहू से सींच न सकें ऐसी ग़ज़ल में कुछ कमी महसूस होगी मुझे हर रचना में एक सच्चाई हो कुछ कल्पना कुछ गहराई हो ऐसा कुछ लिखें और रचें हम कि नासमझी के  अंधेरे को कम कर सकें हम रचनाओं से अपनी एक जीवंत संदेश दे सकें हम उत्साह और समझ से सही को सही और गलत को गलत ठहरा सकें हम भागते ज़माने को ठहराव दें और ठहरे ज़माने को चला सकें हम कुछ को सहारा दें तो कुछ से सहारा पा गति पा सकें हम ऐसी रचना की कल्पना में मैं भी चल तो दी पर क्या इसे पूर्ण  कर पाऊँगी पूर्ण विश्वास है चलूंगी तो पहुँचूगी भी और अंतर्मन को कहीं विश्राम भी दे पाऊँगी  अर्चना