इस रिश्ते को मैं क्या नाम दूं



न तो थी इश्क की ही चाहत 
न ही थी किसी रिश्ते की तलाश
फिर ये कैसा पुल था जो बांधे हुए था 
एक सिरे को दुसरे सिरे से 
हम चल भी रहे थे फिर भी स्थिर थे 
बह भी रहे थे फिर भी थमे हुए से थे

हर गुजरते पल में दूर कुछ नज़र आता था
पास पहुँचने पर फिर एक साए में बदल जाता था 
समझ कर भी क्यों न समझ सके हम कभी
उफनते एहसासों की लहरों को थामे रहे हर सदी
क्या मेल के इस रिश्ते का स्वरूप था कोई
तुम्हारे मेरे बीच बह रही इन तरंगों का अर्थ था कोई

जन्म तो साथ लिया था हमने
और मृत कर विदा ली थी तुमने
फिर ये कैसा ईश्वरीय वरदान था
जन्म जन्मांतर के बंधन का साथ था
कि मिट न सकी रूह से शरीर की दूरी
और अगले जनम तक टल गई एक आस अधूरी

डॉ अर्चना टंडन








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